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poems - page 9

सन्नाटे

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दुःख को मूक, सुखो को मुखरित हो जाने दो, सन्नाटे है बातें करते, हर दम मेरे संग ही रहते, सन्नाटों को और विगुंजित हो जाने दो, दुःख को मूक, सुखों को मुखरित हो जाने दो, घोर अंधेरा है घिर आया, राह नही पड़ता दिखलाई, कितनी दूर मैं चली आई, जीवन के आँगन में, धूप निकल…

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महात्मा गांधी

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गाँधी गाँधी कहते कहते, हम सत्य अहिंसा भूल गये, अपनी पीड़ा तो याद रही, पर पीर पराई भूल गए, अपने अधिकारों का परचम, हर दम लहराना याद रहा, पर स्व कर्म और राष्ट्र धर्म का, दीप जलाना भूल गये, शहीदों की तस्वीरों पर, फूल चढ़ाना याद रहा, पर भुला दिया आदर्शो को, जिनकी ख़ातिर वो…

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शुभकामनाएँ

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हर कदम आपके, मेरी दुआएँ चलें, जीवन सरल बन सके, वो सदाएं चले, मुश्किलों में भी जो, गिर के बिखरें नही, वो हौसला साथ हों, वो जुनूँ साथ हों, फिर मिले आप से, तो ऐसे मिले, हर डगर आपके कदमों के निशाँ साथ हो, आपकी सफलताओं का आसमां साथ हो, अश्रुपूरित नयन संग मधुर हास…

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बचपन

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आँख खुली और टूट गया, एक सपना था जो छूट गया, माँ की लोरी पिता की थपकी, जब जब मेरी आँखें झपकी, देती है मुझको दिखलाई, अपने शहर की याद जो आई, गुल्ली डंडा, खाना पानी, करती थी अपनी मनमानी, उसपर पड़ी डाँट जो खानी, याद आ गयी नानी, मेरे बचपन की कहानी, छतरी थी…

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पर्यावरण

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इन्द्रधनुषी सप्तरंगों का, अब आकाश कहाँ ? धुँए के गुबारो में, सपनों का आवास कहाँ ? गाँवों का हुआ जो शहरीकरण, दूर होती गयी,हमसे शीतल पवन, अब बूँद ओस की झिलमिलाती नहीं, तितलियाँ फूल पर अब इठलाती नही, रूठी तितलियों को चलो फिर से मनाये, आओ मिलकर पेड़ लगायें ।

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पिता की सीख

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जब जन्म लिया इन्सां बन कर, इंसानों जैसे जी तो लो, कुछ दुःख के काँटें कम कर लो, कुछ सुख के फूल खिला तो लो, किसका ऐसा जीवन होगा, जिससे कोई न भूल हुई, जीवन पथ पर चलते चलते, पथ में कोई न शूल हुई, काँटों से ही तो सीखा है, संभलना और संवर जाना,…

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योग दिवस

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हिन्द की जब बात हो, आस्था के मर्म में, योग के संदर्भ में, मानव की ऊर्जाओं का, सफलता की चर्चाओं का, तन मन योग सिक्त हो, विश्व योग दीप्त हो, प्राण का संधान हो, विश्व का कल्याण हो, प्रेम का उद्भाव हो, माधुर्य का प्रभाव हो, शत्रुता का अभाव हो, हर प्राण में सद्भाव हो ।

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महाभारत

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अग्निगर्भा द्रौपदी की, बात है इतनी पुरानी, मान और अपमान के, दस्तूर की ये है कहानी। नारी पर आघात की, और फिर प्रतिघात की, रिश्तों में व्यवधान की, युद्ध के संधान की, दम्भ था विकराल इतना, जल गया संसार कितना, बन गई श्मशान धरती, रह गयी बस रुदन सिसकी। वो कैसी भीष्म प्रतिज्ञा थी, जो…

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जीवन संवाद

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चलो आज फिर काव्य लिखें, जीवन का संभाव्य लिखें, चारो ओर बिखरे जीवन पर, फिर थोड़ा संवाद लिखें, जीवन जीतना गहरा है, उतना ही तो पहरा है, मुक्तिबोध के कुछ छन्दों का, फिर थोड़ा अनुवाद लिखे, युवा मन पर ग्रंथ लिखें, अनुशासन प्रबन्ध लिखें, व्याकुल मन की बेचैनी पर, प्रेम का अनुबंध लिखें, नए सिरे…

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बादल

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बादलों के झुँड से, था झाँकता, नन्हा सा बादल, हँस के कहता है धरा से, फिर बरसूंगा सुबह से, पूर्ण कर जलकुम्भ सारे, ज्यादा बरसूं सह नही पाती, कम बरसूं तो रह नही पाती, तेरे प्यारे सो रहे है, आलस में ही खो रहे है, उन्हें जगा और फिर करा तू, जलप्रबन्ध दुरुस्त सारे, जब…

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