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Vandana Rai

Vandana Rai has 128 articles published.

पिताजी के अंग्रेजी, उर्दू के कुहासे के बीच, मैंने अपनी माँँ के लोकगीतों को ही अधिक आत्मसात किया। उसी लोक संगीत की समझ ने मेरे अंदर काव्य का बीजा रोपण किया। "कवितानामा" मेरी काव्ययात्रा का प्रथम प्रयास नहीं है। इसके पूर्व अनेक पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशनार्थ प्रेषित की, लेकिन सखेद वापस आती रचनाओं ने मेरी लेखनी को कुछ समय के लिए अवरुद्ध कर दिया था। लेकिन कोटिशः धन्यवाद डिजिटल मीडिया के इस मंच को, जिसने मेरी रुकी हुई लेखनी को पुनः एक प्रवाह, एक गति प्रदान कर लिखने के उत्साह को एक बार फिर से प्रेरित किया। पुनश्च धन्यवाद!☺️ वंदना राय

अलाव

in Blogs

मेरे घर के कोने में रखा हुआ ,धूल-धूसरित सा एक मिट्टी का पात्र ,जिसे मैं अलाव के नाम से जानती थी। अचानक मुझसे बातें करने लगा ,कहने लगा, कि तुम्हें याद है ?वो जाड़े के दिन ,जब तुम अपने खूब सारे भाई बहनों और माता पिता के साथ मेरे इर्द-गिर्द बैठकर घंटों मेरे साथ अपनत्व…

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दुनियादारी

in poems

कुछ नर्म से रिश्तो का ,अधूरा सा फसाना है। ग़र समझ सको ,समझना ,यह दर्द पुराना है। जब साथ हो अधूरा ,तो लोग मचलते हैं। जख्मों पर छिड़कने को, नमक लेकर ही चलते हैं । घर में खुशी हो ,चाहे गम की हवा बही हो। देकर बुलावा घर में ,अनजान से रहते हैं। जब याद…

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जीवन चक्र

in poems

आस-पास बिखरे रंगों में, बादल पर्वत और उपवन में, जीवन विस्तारित होता हर कण में, इनमें गुंजित ध्वनियां देखो क्या कहती है? कहती हैं, हर रंग में जीवन, खिलता ही है, उमड़ घुमड़ कर बादल सा मन, खाली होता। खाली होकर ऊपर उठता, पर्वत सा फिर,और उपवन में, फूलों सा मन, विकसित होता। यही चक्र…

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सूरज

in poems

हर सुबह उम्मीदों का सूरज, उगता ढलता दे जाता है , कुछ स्वप्न नये, कुछ पंख नये, कुछ अरमानों के रंग नये , देता है कुछ संदेश नए , नवजीवन के परिवेश नये, ठिठुरे सिकुड़े मनोभावों को, उष्माओं के कुछ अंश नये। जब नए उम्मीदों का दीपक , बुझने को आतुर होता है, तब सूरज…

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हे नए साल

in poems

सपनों की दीर्घ वीथिका में, अगणित रंगों के इंद्रधनुष, लेकर आए ये नया साल । कुछ हास नए ,उल्लास नए , जीवन के कुछ अभिलाष नए, है पलक पांवड़े बिछे हुए , स्वागत में तोरण सजे हुए, आना तो खुशियां ले आना, दुनिया के आंसू ले जाना, इस वर्ष बहुत तड़पाया है, दुनिया को कितना…

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साथ तेरे

in poems

जो समय बिताया, साथ तेरे, वो समय नहीं छोड़ा मैं ने, वो हरपल मेरे साथ रहा, तेरी यादों के एहसास तले। जब साथ तुम्हारे होते थे, कभी हंसते थे, कभी रोते थे। अब हंसना,रोना छोड़ दिया, दुनियादारी के बोझ तले। जब संग तुम्हारे, मीलों तक, बेमतलब घूमा करते थे, वो यादें अब भी जीने का,…

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छठ पूजा

in poems

सुबह सवेरे प्रथम किरण के , पहले उठकर सज जाना , फिर छठ की पूजा को तत्पर, नदी किनारे पर जाना। मां से ज्यादा हम बच्चों का , उत्साहित होकर गाना, नदी किनारे जाने की , बेताबी को हमने जाना । ठंडे पानी में उतर सूर्य की, पूजा को ,कर घर आना । आनंदित करता…

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in poems

घनघोर अमावस में आस की, अंतिम किरण अवशेष हैं, डूबती ही जा रही, मानवता, आकंठ भ्रष्टाचार में, फिर भी जीवन के तट पर, ‘उम्मीद का नाविक’ अकेला शेष है।

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साझेदारी

in Blogs

मेरे बाबा ,जिनके गुस्से से घर में मेरी मां और सारे भाई बहन डरते थे ।वो जब किसी बात पर नाराज होते थे ,तो किसी की हिम्मत नहीं होती थी ,कि उन्हें भोजन कक्ष में उन्हे बुला कर ले आए ।मैं घर में सबसे छोटी थी। शायद सबसे निर्भीक भी ,इसलिए जब बाबा गुस्से में…

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हिंदी भाषा की व्यथा

in Blogs

मैं हिंदी भाषा हूं, आजकल कुछ उदास सी रहती हूं, क्योकि मेरे अपनों ने मेरी परवाह करना छोड़ दिया है ।लेकिन हमेशा ऐसा नहीं था ,मैंने जीवन का बेहद सुनहरा दौर भी देखा है। मैंने महादेवी वर्मा ,जयशंकर प्रसाद और निराला जैसे महान छायावादी कवियों का दौर भी देखा है । वो मेरी खुशनुमा तरुणाई…

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