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Love

मातृदिवस

in poems

मां ,तू पास नहीं पर, मुझमें स्पंदित रहती, मेरे जीवन के हर पग पर, तू प्रतिबिंबित रहती। पता नही, कैसे?पर, तू आभासित रहती। जीवन के हर पथ पर, मुझको परिभाषित करती। आती जाती बाधाओं को, तू बाधित कर जाती, हिचकोले खाते जीवन को, तू ही राह दिखाती। संदर्भित इस मातृदिवस पर, फिर प्रसंग है आया,।…

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नींव का पत्थर

in poems

जिस की कोमल अनुभूति से, श्वांसे धड़क रही हैं, बन के घर के नींव का पत्थर, फिर भी सिसक रही हैं। उसे “एक” दिन प्रेम प्रर्दशन में, दुनिया न समेटे, जो दुनिया को नवजीवन, और देती बेटी बेटे। जाकर कोई समझाओ, दुनिया उनके आंसू पोंछे, तब सार्थकता मातृदिवस की, जब मांओं की पीड़ा सोखे।

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शकुन्तला

in poems

क्रोध को जीता नहीं, और दे दिया अभिशप्त जीवन। शकुन्तला जब बैठ कुटिया में, कर रही थी, मधुर चिंतन। दोष उसका बस यही था, देख न पाई प्रलय को, भावना में बह गयी, पी गयी पीड़ा के गरल को। निर्दोष शकुन्तला सोच रही, वो किस समाज का हिस्सा है? अपने अस्तित्व को खोज रही, ये…

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वक्त का दरिया

in poems

सोचा था कि……., जब कभी वक्त नहीं होगा, एहसास की लहरों पर, मैं खुद को भिगो लूंगी । जब फूल भी ना होंगे तब खुश्क से मौसम में, पत्तों के खड़कने पर, संगीत बना लूंगी। पेड़ों पर आएगी, जब भी नयी तरुणाई, नव शब्द की माला से, नए गीत बना लूंगी। अब वक्त के बहते…

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नारी

in poems

परिभाषित हो प्रेम, जहां पर, भावों से परिपूर्ण वहां पर, तुम मिलती हो। प्रासंगिक हो, जब करुणा का सार, वहां पर, तुम मिलती हो। स्पंदित हो,हर जीवन में प्राण, जहां पर तुम बसती हो।

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विश्वास

in poems
Trust

प्रेम हो विश्वास हो, न्याय का अहसास हो, धुंधलाते परिदृश्य में भी, न्याय की ही बात हो।

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इंतजार में…!

in poems

जा रहा है दिसंबर, ये साल छोड़कर, कि अगले वर्ष आएगा, फिर ठिठुरन ओढ़कर, हर वर्ष की तरह ही, यह वर्ष भी गया, लेकिन इस वर्ष का, अनुभव बहुत नया। कुछ फुर्सत के पल रहे, कुछ ख्वाहिशों के दौर, ज्यों आम के पेड़ों पर , मंजरियों का बौर, जीवन के अनुभवों से, सीख जो मिली,…

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अनकही सी बातें

in poems

कुछ अनकही सी बातें, जो कह रही हूं तुमसे, कम को अधिक समझना, ग़र हो सके जो तुमसे। तेरी बात में था मरहम, वो भी था इक ज़माना, अब काम का बवंडर, है व्यस्तता बहाना। प्रश्नो का है समंदर, और दर्द मेरे अंदर, बहने को है आकुल, ये सोच के हूं व्याकुल। परवाह तो है…

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मेरा गट्टू

in poems

मेरा है गट्टू खरगोश, देता है मन को परितोष , प्यार जताता, खुशी दिखाता, जब आती हूं ,घर को लौट, कान झटक और मटक मटक, जब चलता है तो लगता है , नन्हा सा कोई बच्चा यूं ही , मचल मचल कर चलता है , सुबह सवेरे सही समय पर, आकर मुझे जगाता है, जैसे…

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