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Feeling

फिक्र

in poems

है फिक्र उन्हे मेरी कितनी, ये मुझको भी मालूम नही, लोगों से कहते फिरते हैं, क्या कहते हैं, मालूम नही| है जेब गरम उनकी कितनी, ये बतलाना होता है, मेरी जेबों के छेदों को, गिनकर जतलाना होता है|   पैसों की गर्मी अहंकारवश, कब शोला बन जाती है! रावण की सोने की लंका, कब मिट्टी…

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आरक्षण

in poems

स्वतंत्रता की स्वर्ण-जयन्ती को, बीत गए कई साल। जातिवाद के आरक्षण से, प्रतिभाएं अब भी बेहाल। श्रम का हो सम्मान, सभी को अवसर मिलें समान। अभिनन्दित हो युवा देश का, हो प्रतिभाएं गतिमान। एक बार फिर ज्ञानमार्ग जब, प्रक्षालित हो जाएगा। फिर से अपना देश,ये “भारत” विश्व गुरु बन जाएगा।

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सावन

in poems

मन ने फिर आवाज लगाई, अब तो रहे न बाबा-आई। जो कहते सावन में आओ, भाई को राखी बंधवाओ। इस आमंत्रण से गर्वित हो, जब-जब मैं पीहर को जाती, आंखों में नेह-अश्रु लिए तब, बाबा-आई को मैं पाती। न वैसा आमंत्रण है,अब। न वैसा त्योहार……। सम्बन्धों के खालीपन से, अनुगुंजित आवास……।

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बात

in poems

बात निकली है तो, बात पे बात निकलेगी। बीती बातों की पूरी, बारात निकलेगी। शिकवा उनको भी है, शिकायत हमको भी है। बढ़ेगी जो बात तो, आंखों से बरसात निकलेगी भावों के पत्ते तो, झड़ ही गये। हो दिल में बची आस, तो मुलाकात निकलेगी।

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रिश्तों के हिम

in poems

जो मैंने कहा था, वो आप ने सुना नही, जो मैंने कहा नहीं, वो आप ने सुना था। रिश्तों के ये जो बाने हैं, वो हमने खुद ही ताने है। थोड़ा थोड़ा आगे बढ़कर, रिश्तों के हिम को पिघलाएं, मैं थोड़ा सा आगे आऊं, वो थोड़ा सा पीछे जाएं, फिर अपने इस तालमेल को, ये…

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बरखा रानी

in poems

बरखा रानी तेरा पानी, हर मन को हरषाता। तेरा आना उमड़ घुमड़ कर, तन पुलकित हो जाता। बरखा बोली, ‘धरती रानी’, तेरा जीवन,मेरा पानी, फिर क्यूं व्यर्थ बहाती, ज्यादा बरसूं, कद्र नहीं, कम बरसूं, तो सब्र नहीं।  

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ध्वनियां

in poems

अक्सर हम वो सुन नहीं पाते, जो ये दुनिया कहती हैं। और कभी हम बिना कहे भी, बहुत कुछ सुन जाते है। वे ध्वनियां जो ध्वनित नहीं हो, ज्यादा शोर मचाती है। दिन का चैन उड़ा देती हैं, रातों को जगाती हैं।

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व्योम,……धरा से।

in poems

  हंस कर कहता, व्योम, धरा से। सूरज चांद सितारे, ये हैं मेरे सारे । तेरे अपने कौन ? बता मुझे, न रह मौन। धरती ने ली अंगड़ाई, फिर थोड़ी शरमाई, अगणित चांद सितारे मेरे, क्यूं जलता है भाई ? मोदी ने भारत चमकाया, राष्ट्रवाद परचम लहराया। जिसकी चमकीली ऊर्जा ने, ऊंच नीच का भेद…

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क्या लिखूं?

in poems

तुम्हारे  दर्द को पी लूं , उन्हे कुछ राहतें दे दूं। मैं किस्सा ए कहर लिखूं , या तेरा सबर लिखूं। भिगोया है, कलम को मैंने, ज़ज़्बातो की स्याही से , सच्चाई दर-बदर कर दूं? या फिर मौन अनवरत रखूं।

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बचपन

in poems

मस्तमौला फक्कड़पन, मासूमियत भरा बचपन, महंगे खिलौनों की दरकार नहीं। माटी से काम चला लेंगे,   हम आनंद मना लेंगे। ये भोलापन,ये अल्हड़पन, जिसको कहते हैं,सब बचपन।

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