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Feeling

दुनियादारी

in poems

कुछ नर्म से रिश्तो का ,अधूरा सा फसाना है। ग़र समझ सको ,समझना ,यह दर्द पुराना है। जब साथ हो अधूरा ,तो लोग मचलते हैं। जख्मों पर छिड़कने को, नमक लेकर ही चलते हैं । घर में खुशी हो ,चाहे गम की हवा बही हो। देकर बुलावा घर में ,अनजान से रहते हैं। जब याद…

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जीवन चक्र

in poems

आस-पास बिखरे रंगों में, बादल पर्वत और उपवन में, जीवन विस्तारित होता हर कण में, इनमें गुंजित ध्वनियां देखो क्या कहती है? कहती हैं, हर रंग में जीवन, खिलता ही है, उमड़ घुमड़ कर बादल सा मन, खाली होता। खाली होकर ऊपर उठता, पर्वत सा फिर,और उपवन में, फूलों सा मन, विकसित होता। यही चक्र…

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सूरज

in poems

हर सुबह उम्मीदों का सूरज, उगता ढलता दे जाता है , कुछ स्वप्न नये, कुछ पंख नये, कुछ अरमानों के रंग नये , देता है कुछ संदेश नए , नवजीवन के परिवेश नये, ठिठुरे सिकुड़े मनोभावों को, उष्माओं के कुछ अंश नये। जब नए उम्मीदों का दीपक , बुझने को आतुर होता है, तब सूरज…

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हे नए साल

in poems

सपनों की दीर्घ वीथिका में, अगणित रंगों के इंद्रधनुष, लेकर आए ये नया साल । कुछ हास नए ,उल्लास नए , जीवन के कुछ अभिलाष नए, है पलक पांवड़े बिछे हुए , स्वागत में तोरण सजे हुए, आना तो खुशियां ले आना, दुनिया के आंसू ले जाना, इस वर्ष बहुत तड़पाया है, दुनिया को कितना…

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साथ तेरे

in poems

जो समय बिताया, साथ तेरे, वो समय नहीं छोड़ा मैं ने, वो हरपल मेरे साथ रहा, तेरी यादों के एहसास तले। जब साथ तुम्हारे होते थे, कभी हंसते थे, कभी रोते थे। अब हंसना,रोना छोड़ दिया, दुनियादारी के बोझ तले। जब संग तुम्हारे, मीलों तक, बेमतलब घूमा करते थे, वो यादें अब भी जीने का,…

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in poems

घनघोर अमावस में आस की, अंतिम किरण अवशेष हैं, डूबती ही जा रही, मानवता, आकंठ भ्रष्टाचार में, फिर भी जीवन के तट पर, ‘उम्मीद का नाविक’ अकेला शेष है।

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पीहर

in poems

सावन की बदरी फिर छाई, मस्त हवाएं फिर बौराई , बूंदें बरसी , सड़कें भींगी, भींग गई, मन की बगियां, मां बाबा फिर याद आ गये, याद आई उनकी बतियां, हर सावन पर पीहर से, जब जब आमंत्रण आता था, मन मयूर तब नाच नाच कर, अपना जश्र मनाता था । मां बाबा के होने…

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बीती बातें

in poems

याद आती हैं, बीती बातें, खट्टी मीठी कड़वी यादें, जीवन में आगे बढ़ते भी, छूट कहां पाती हैं यादें। प्रासंगिक होता जाता है, अनुभव के दरिया में उतरना, सार रहित होता जाता है, चकाचौंध के बीच गुजरना। जीवन के हर पल में कुछ तो, मर्म छुपा होता है,इन्हें समझना, आगे बढ़ना, व्यर्थ कहां होता है?…

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मज़दूरों का हाल…

in poems

सबकी छत  बनाने वाले, महलों को चमकाने वाले, क्यूं इतने मजबूर हुए है?भूख से थककर चूर हुए हैं। नींव की ईंटें रोयी थीं,तब। मजदूरों का हाल देख कर। आसमान बेचैन हुआ था,बचपन को बदहाल देखकर। न रोटी, न काम रहा जब, रहने को आवास रहा कब? उनके जलते छालों पर भी, राजनीति के काम हुए…

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बहुत याद आता है…

in poems

याद आ रहा, गांव हमारा, बांसों का झुरमुट,वो न्यारा। जहां रातों के अंधियारे में, जुगनू जगमग करते थे, आमों  के बागीचे में, झिंगुर बोला करते थे, चांद और तारों  के नीचे, बिस्तर डाला करते थे, सप्तऋषि से तारों की, दूरी को नापा करते थे।   समय का पहिया घूम घूमकर, शहरों तक ले आया, लेकिन…

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