Tag archive

Hindi Poem

विडंबना

in poems

रक्तिम है कुरुक्षेत्र की माटी , चीख रही है अब भी घाटी, कर्तव्यों से आंख मूंदकर, बन जाना गांधारी , ऐसी थी क्या लाचारी ? लालच के दावानल, जब अपनों को झुलसाएंगे , कलयुग की इस विडंबना में, कृष्ण कहां से आएंगे ? सिंहासन पर यदि विराजित, धृतराष्ट्र हो जाएंगे , प्रतिभाओं के चीरहरण पर…

Keep Reading

तेरा जाना…….|

in poems

तेरे जाने की धुन सुनकर , वसंत कहीं रुक जाता है, आंखों का आंसू ओसबिंदु बन, घासों पर बिछ जाता है । शिशिर ऋतु है ,तेज हवा , सूरज की आंख मिचौली है। है भींगें से कुछ नयन  और, होठों पर हंसी ठिठोली है । आंखों में आंसू रुक जाता, तो कोहरा कोहरा दिखता है…

Keep Reading

संदेश

in poems

गणतंत्र की सुनहरी, फिर शाम आ रही है। सूरज की लालिमा यह, संदेश गा रही है । हम सब हैं भाई बंधु , यह देश है हमारा, अक्षुण्ण है, जिसकी संस्कृति, अनमोल भाईचारा। मिलजुल कर हम जिएंगे, फिर ज़हर ना पिएंगे, इंसानियत के दुश्मन, हमको नहीं गवारा। चलो यह प्रण भी ले लें । अभी…

Keep Reading

तलाश

in poems

महलों की सिसकती दीवारों को, कौन शब्द दे पाएगा? स्वर्ण दिनारों के शोरगुल में , दर्द दफन हो जाएगा | रत्न जड़ित वस्त्रों की चकमक , सेवक, दासों का दल बल , अंतर्मन की पीड़ा पर , मरहम कौन लगाएगा ? श्वासों पर भी पहरे जिनके, हंसी पे ताले जड़ते हो, ऐसी घुटती श्वांसों का, शोर…

Keep Reading

कलयुग

in poems

जब त्रेता के स्वर्ण हिरण ने, सीता हरण करा डाला, जब सत्य की खातिर हरिश्चंद्र को, सतयुग ने बिकवा डाला, तब कलयुग की है क्या बिसात ? जो स्वर्ण मोह से बच जाए, या फिर असत्य से दूर रहे , और सत्य वचन पर टिक जाए , अब तो कलयुग की बारी है, और लोलुपता…

Keep Reading

फिक्र

in poems

है फिक्र उन्हे मेरी कितनी, ये मुझको भी मालूम नही, लोगों से कहते फिरते हैं, क्या कहते हैं, मालूम नही| है जेब गरम उनकी कितनी, ये बतलाना होता है, मेरी जेबों के छेदों को, गिनकर जतलाना होता है|   पैसों की गर्मी अहंकारवश, कब शोला बन जाती है! रावण की सोने की लंका, कब मिट्टी…

Keep Reading

शंकर

in poems

जीवन के दहकते प्यालों में, हर पीड़ा को जल जाने दो, उस राख से नवनिर्माण करो, सुख परिभाषित हो जाने दो| बाधाओं का उत्तुंग शिखर, उस पर बर्फीली आंधी को, जिसने झेला स्थिर होकर, उसमें वासित होते शंकर|

Keep Reading

ख्वाहिशें

in poems

चलो, बढ़ती हुई उम्र के साए में बैठकर , जीवन की तेज धूप से , कुछ फासले कर लें, चाहतों से भरे इस जीवन को , चलो, आज खाली कर लें , रोज बदलते किरदारों से , आज ,अभी ,तौबा कर लें , तुम अपनी तन्हाइयों को , रुखसत कर दो, हम अपने सन्नाटों से…

Keep Reading

उर्मिला का वनवास

in poems

उर्मिला बोली लक्ष्मण से, व्यथित हृदय पर मृदु वचन से, तुमको भाई का साथ मिला, मुझे महलों का वनवास मिला, दोष बता जाते मेरे, तो दूर उन्हें मैं कर पाती, फिर संग तुम्हारे जा पाती, और साथ तुम्हारे रह पाती, यूं बिना कहे तुम चले गए, इस भवसागर में छोड़ गए, किस से पूछूं किस…

Keep Reading

मातृभूमि

in poems

वो जीना भी क्या जीना है, जो देश हित में जी न सके, वो मरना भी क्या मरना है, जो मातृभूमि पर मर न सके। कितने अनजाने वीरों ने, अपने जो रक्त बहाएं हैं, इस देश के मिट्टी पानी में, उन वीरों की गाथाएं हैं। झांसी की मिट्टी कहती हैं, हर बाला लक्ष्मीबाई हो, पंजाब…

Keep Reading

Go to Top