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emotions

पीहर

in poems

सावन की बदरी फिर छाई, मस्त हवाएं फिर बौराई , बूंदें बरसी , सड़कें भींगी, भींग गई, मन की बगियां, मां बाबा फिर याद आ गये, याद आई उनकी बतियां, हर सावन पर पीहर से, जब जब आमंत्रण आता था, मन मयूर तब नाच नाच कर, अपना जश्र मनाता था । मां बाबा के होने…

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बीती बातें

in poems

याद आती हैं, बीती बातें, खट्टी मीठी कड़वी यादें, जीवन में आगे बढ़ते भी, छूट कहां पाती हैं यादें। प्रासंगिक होता जाता है, अनुभव के दरिया में उतरना, सार रहित होता जाता है, चकाचौंध के बीच गुजरना। जीवन के हर पल में कुछ तो, मर्म छुपा होता है,इन्हें समझना, आगे बढ़ना, व्यर्थ कहां होता है?…

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मज़दूरों का हाल…

in poems

सबकी छत  बनाने वाले, महलों को चमकाने वाले, क्यूं इतने मजबूर हुए है?भूख से थककर चूर हुए हैं। नींव की ईंटें रोयी थीं,तब। मजदूरों का हाल देख कर। आसमान बेचैन हुआ था,बचपन को बदहाल देखकर। न रोटी, न काम रहा जब, रहने को आवास रहा कब? उनके जलते छालों पर भी, राजनीति के काम हुए…

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तेरा जाना…….|

in poems

तेरे जाने की धुन सुनकर , वसंत कहीं रुक जाता है, आंखों का आंसू ओसबिंदु बन, घासों पर बिछ जाता है । शिशिर ऋतु है ,तेज हवा , सूरज की आंख मिचौली है। है भींगें से कुछ नयन  और, होठों पर हंसी ठिठोली है । आंखों में आंसू रुक जाता, तो कोहरा कोहरा दिखता है…

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संदेश

in poems

गणतंत्र की सुनहरी, फिर शाम आ रही है। सूरज की लालिमा यह, संदेश गा रही है । हम सब हैं भाई बंधु , यह देश है हमारा, अक्षुण्ण है, जिसकी संस्कृति, अनमोल भाईचारा। मिलजुल कर हम जिएंगे, फिर ज़हर ना पिएंगे, इंसानियत के दुश्मन, हमको नहीं गवारा। चलो यह प्रण भी ले लें । अभी…

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दोषी कौन ?

in Stories

राघव की उम्र यही कोई 18 वर्ष की रही होगी ,घर में सिर्फ दादी और पोता राघव |आपस में लड़ते झगड़ते, लाड़- दुलार करते ,हंसी-खुशी के पल बिता रहे थे |लेकिन अचानक दादी की तबीयत बिगड़ी और वेैद्य ने उनके अंतिम समय का एलान कर दिया |अब दादी को यह चिंता हो गई कि, राघव…

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कलयुग

in poems

जब त्रेता के स्वर्ण हिरण ने, सीता हरण करा डाला, जब सत्य की खातिर हरिश्चंद्र को, सतयुग ने बिकवा डाला, तब कलयुग की है क्या बिसात ? जो स्वर्ण मोह से बच जाए, या फिर असत्य से दूर रहे , और सत्य वचन पर टिक जाए , अब तो कलयुग की बारी है, और लोलुपता…

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शंकर

in poems

जीवन के दहकते प्यालों में, हर पीड़ा को जल जाने दो, उस राख से नवनिर्माण करो, सुख परिभाषित हो जाने दो| बाधाओं का उत्तुंग शिखर, उस पर बर्फीली आंधी को, जिसने झेला स्थिर होकर, उसमें वासित होते शंकर|

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ख्वाहिशें

in poems

चलो, बढ़ती हुई उम्र के साए में बैठकर , जीवन की तेज धूप से , कुछ फासले कर लें, चाहतों से भरे इस जीवन को , चलो, आज खाली कर लें , रोज बदलते किरदारों से , आज ,अभी ,तौबा कर लें , तुम अपनी तन्हाइयों को , रुखसत कर दो, हम अपने सन्नाटों से…

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मातृभूमि

in poems

वो जीना भी क्या जीना है, जो देश हित में जी न सके, वो मरना भी क्या मरना है, जो मातृभूमि पर मर न सके। कितने अनजाने वीरों ने, अपने जो रक्त बहाएं हैं, इस देश के मिट्टी पानी में, उन वीरों की गाथाएं हैं। झांसी की मिट्टी कहती हैं, हर बाला लक्ष्मीबाई हो, पंजाब…

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