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Vandana Rai - page 10

Vandana Rai has 98 articles published.

पिताजी के अंग्रेजी, उर्दू के कुहासे के बीच, मैंने अपनी माँँ के लोकगीतों को ही अधिक आत्मसात किया। उसी लोक संगीत की समझ ने मेरे अंदर काव्य का बीजा रोपण किया। "कवितानामा" मेरी काव्ययात्रा का प्रथम प्रयास नहीं है। इसके पूर्व अनेक पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशनार्थ प्रेषित की, लेकिन सखेद वापस आती रचनाओं ने मेरी लेखनी को कुछ समय के लिए अवरुद्ध कर दिया था। लेकिन कोटिशः धन्यवाद डिजिटल मीडिया के इस मंच को, जिसने मेरी रुकी हुई लेखनी को पुनः एक प्रवाह, एक गति प्रदान कर लिखने के उत्साह को एक बार फिर से प्रेरित किया। पुनश्च धन्यवाद!☺️ वंदना राय

पिता पुत्री संवाद

in poems

मैं तेरी हूं बिटिया रानी, बाबा कहो ना एक कहानी, सुख दुख की बातें बतलाओ, दुनियादारी तुम सिखलाओ, दूर रहूंगी तुमसे कैसे? फिर जिद ना करूंगी तुमसे ऐसे, पास बैठ कर समय बिताओ, जीने की तुम राह दिखाओ, बाबा बोले गुड़िया रानी, बातों में तुम मेरी नानी, अब तक करती थी मनमानी, यह कैसे परिवर्तन…

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विरहगीत

in poems

तारों की टिमटिम में हो तुम, चिड़ियों की चहचह में हो तुम, गंगा कि कलकल ध्वनि में तुम, नटराज के डमरु की ध्वनि तुम, गुंजित हो सभी दिशाओं में, प्रतिष्ठित हो ह्रदय में तुम। यूं अनायास क्यों चले गए? मुझको तन्हा क्यों छोड़ गए? संगीत की धुन बन लौट आओ, मेरे जीवन में छा जाओ।…

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मोहनदास करमचंद गांधी

in poems

स्वच्छता था जीवन संदेश, सहिष्णुता उनका मंत्र विशेष, सत्य और अहिंसा के दम पर, जिसने कराया राज्याभिषेक, रक्तरंजित युद्धों को जिसने, अहिंसा का पैगाम दिया, असहयोग के शस्त्र से जिसने सत्ता को भयभीत किया, जन जन की आवाज था जो, स्वतंत्रता की परवाज था जो, विश्व पटल पर अंकित है, जिसका स्वर्णिम इतिहास, उसको दुनिया…

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गांधी

in poems

वंचित न हो दुनिया में, कोई मौलिक अधिकारों से, समानता की अलख जगाएँँ, हम अपने व्यवहारोंं से, वो युगद्रष्टा, वो राष्ट्रपिता, वो करुणा का पालनकर्ता, खादी जिसकी पहचान है, जिसका जीवन दृष्टांत है, उस गांधी के आदर्शों के, हम फिर से दीप जलाएँँ , भ्रमित हुए युवा मन को, हम रौशन पथ पर लाएं।

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यादें

in poems

यूं ही बैठे हुए गुज़रा ज़माना याद आया, क्या होता है जिंदगी का स्वाद याद आया, यादों का सफर चलचित्र सा चलता ही गया, तारों को देख, अमावस का गहराना याद आया, समय की धार में जो जाने कहां खो गया, दिल के टुकड़ों में जो अपनी परछाई दे गया, जाते-जाते जो आंखों को पानी…

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शिक्षक

in poems

अंधेरी स्याह रात में, जो दीप बन के जल रहा, प्रबुद्ध हो के आज भी, पहचान को तरस रहा। जो राष्ट्र का स्तंभ है, समाज का प्रबंध है, विद्यालय की शान है, समाज का अभिमान है, कहने कि जितनी बातें हैं, उस पर उतनी ही घाते हैं, मर्माहत उसकी प्राते हैं, जब दोषी उसे बताते…

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माँ

in poems

तू कैसे जान लेती है माँ मेरी भूख को, मेरी प्यास को मैं चाहती हूं क्या? और मेरी आस को ? वो कौन सा जादू है माँ वो मुझे भी सीखा दे तू वो कौन सी थाती है माँ वो मुझे भी दिखा दे तू दुनिया के सारे गरल कर पान तू जीवित रही कैसे…

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