छठ पूजा

in poems

सुबह सवेरे प्रथम किरण के ,
पहले उठकर सज जाना ,
फिर छठ की पूजा को तत्पर,
नदी किनारे पर जाना।
मां से ज्यादा हम बच्चों का ,
उत्साहित होकर गाना,
नदी किनारे जाने की ,
बेताबी को हमने जाना ।
ठंडे पानी में उतर सूर्य की,
पूजा को ,कर घर आना ।
आनंदित करता है ,अब भी ,
छठ पूजा का वो गाना।
अब तो मां का आंचल है, ना।
छठ की पूजा पर जाना,
लेकिन जीवन ऊर्जाओं का,
उस पल से है ताना-बाना।

पिताजी के अंग्रेजी, उर्दू के कुहासे के बीच, मैंने अपनी माँँ के लोकगीतों को ही अधिक आत्मसात किया। उसी लोक संगीत की समझ ने मेरे अंदर काव्य का बीजा रोपण किया। "कवितानामा" मेरी काव्ययात्रा का प्रथम प्रयास नहीं है। इसके पूर्व अनेक पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशनार्थ प्रेषित की, लेकिन सखेद वापस आती रचनाओं ने मेरी लेखनी को कुछ समय के लिए अवरुद्ध कर दिया था। लेकिन कोटिशः धन्यवाद डिजिटल मीडिया के इस मंच को, जिसने मेरी रुकी हुई लेखनी को पुनः एक प्रवाह, एक गति प्रदान कर लिखने के उत्साह को एक बार फिर से प्रेरित किया। पुनश्च धन्यवाद!☺️ वंदना राय

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