बहुत याद आता है…

in poems

याद आ रहा, गांव हमारा,

बांसों का झुरमुट,वो न्यारा।

जहां रातों के अंधियारे में,

जुगनू जगमग करते थे,

आमों  के बागीचे में,

झिंगुर बोला करते थे,

चांद और तारों  के नीचे,

बिस्तर डाला करते थे,

सप्तऋषि से तारों की,

दूरी को नापा करते थे।

 

समय का पहिया घूम घूमकर,

शहरों तक ले आया, लेकिन जो दिल में बसता,

वो गांव कहां, मिल पाया?

मिट्टी की वो सोंधी खुशबू,

कोयल की मीठी सी कुहू कुहू,

आंधी में अमियां का गिरना,

फिर उनको भी दौड़ दौड़ कर,

भरी दुपहरी में था, चुनना।

उतना सहज सरल जीवन,

ये शहर कहां दे पाया?

मेरे प्यारे गांव, मुझे तू,

याद बहुत ही आया।

 

 

पिताजी के अंग्रेजी, उर्दू के कुहासे के बीच, मैंने अपनी माँँ के लोकगीतों को ही अधिक आत्मसात किया। उसी लोक संगीत की समझ ने मेरे अंदर काव्य का बीजा रोपण किया। "कवितानामा" मेरी काव्ययात्रा का प्रथम प्रयास नहीं है। इसके पूर्व अनेक पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशनार्थ प्रेषित की, लेकिन सखेद वापस आती रचनाओं ने मेरी लेखनी को कुछ समय के लिए अवरुद्ध कर दिया था। लेकिन कोटिशः धन्यवाद डिजिटल मीडिया के इस मंच को, जिसने मेरी रुकी हुई लेखनी को पुनः एक प्रवाह, एक गति प्रदान कर लिखने के उत्साह को एक बार फिर से प्रेरित किया। पुनश्च धन्यवाद!☺️ वंदना राय

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