विडंबना

in poems

रक्तिम है कुरुक्षेत्र की माटी ,

चीख रही है अब भी घाटी,

कर्तव्यों से आंख मूंदकर,

बन जाना गांधारी ,

ऐसी थी क्या लाचारी ?

लालच के दावानल,

जब अपनों को झुलसाएंगे ,

कलयुग की इस विडंबना में,

कृष्ण कहां से आएंगे ?

सिंहासन पर यदि विराजित,

धृतराष्ट्र हो जाएंगे ,

प्रतिभाओं के चीरहरण पर ,

भीष्म मौन हो जाएंगे,

कुरुक्षेत्र फिर सज्जित होगा ,

शांतिदूत न आएंगे।

पिताजी के अंग्रेजी, उर्दू के कुहासे के बीच, मैंने अपनी माँँ के लोकगीतों को ही अधिक आत्मसात किया। उसी लोक संगीत की समझ ने मेरे अंदर काव्य का बीजा रोपण किया। "कवितानामा" मेरी काव्ययात्रा का प्रथम प्रयास नहीं है। इसके पूर्व अनेक पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशनार्थ प्रेषित की, लेकिन सखेद वापस आती रचनाओं ने मेरी लेखनी को कुछ समय के लिए अवरुद्ध कर दिया था। लेकिन कोटिशः धन्यवाद डिजिटल मीडिया के इस मंच को, जिसने मेरी रुकी हुई लेखनी को पुनः एक प्रवाह, एक गति प्रदान कर लिखने के उत्साह को एक बार फिर से प्रेरित किया। पुनश्च धन्यवाद!☺️ वंदना राय

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