तेरा जाना…….|

in poems

तेरे जाने की धुन सुनकर ,

वसंत कहीं रुक जाता है,

आंखों का आंसू ओसबिंदु बन,

घासों पर बिछ जाता है ।

शिशिर ऋतु है ,तेज हवा ,

सूरज की आंख मिचौली है।

है भींगें से कुछ नयन  और,

होठों पर हंसी ठिठोली है ।

आंखों में आंसू रुक जाता,

तो कोहरा कोहरा दिखता है ।

धुंधला जाती है दृष्टि और ,

श्यामल श्यामल सा दिखता है ।

कैसे कह दूं ,कि मत जाओ ।

जीवन के पथ पर रुक जाओ ,

रुकना जीवन का ध्येय  नहीं,

जब चलते रहना जीवन है।

पिताजी के अंग्रेजी, उर्दू के कुहासे के बीच, मैंने अपनी माँँ के लोकगीतों को ही अधिक आत्मसात किया। उसी लोक संगीत की समझ ने मेरे अंदर काव्य का बीजा रोपण किया। "कवितानामा" मेरी काव्ययात्रा का प्रथम प्रयास नहीं है। इसके पूर्व अनेक पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशनार्थ प्रेषित की, लेकिन सखेद वापस आती रचनाओं ने मेरी लेखनी को कुछ समय के लिए अवरुद्ध कर दिया था। लेकिन कोटिशः धन्यवाद डिजिटल मीडिया के इस मंच को, जिसने मेरी रुकी हुई लेखनी को पुनः एक प्रवाह, एक गति प्रदान कर लिखने के उत्साह को एक बार फिर से प्रेरित किया। पुनश्च धन्यवाद!☺️ वंदना राय

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