कलयुग

in poems

जब त्रेता के स्वर्ण हिरण ने,

सीता हरण करा डाला,

जब सत्य की खातिर हरिश्चंद्र को,

सतयुग ने बिकवा डाला,

तब कलयुग की है क्या बिसात ?

जो स्वर्ण मोह से बच जाए,

या फिर असत्य से दूर रहे ,

और सत्य वचन पर टिक जाए ,

अब तो कलयुग की बारी है,

और लोलुपता की आरी है,

जब धन पूजा से यारी है,

तब नैतिकता भी हारी है|