कलयुग

in poems

जब त्रेता के स्वर्ण हिरण ने,

सीता हरण करा डाला,

जब सत्य की खातिर हरिश्चंद्र को,

सतयुग ने बिकवा डाला,

तब कलयुग की है क्या बिसात ?

जो स्वर्ण मोह से बच जाए,

या फिर असत्य से दूर रहे ,

और सत्य वचन पर टिक जाए ,

अब तो कलयुग की बारी है,

और लोलुपता की आरी है,

जब धन पूजा से यारी है,

तब नैतिकता भी हारी है|

पिताजी के अंग्रेजी, उर्दू के कुहासे के बीच, मैंने अपनी माँँ के लोकगीतों को ही अधिक आत्मसात किया। उसी लोक संगीत की समझ ने मेरे अंदर काव्य का बीजा रोपण किया। "कवितानामा" मेरी काव्ययात्रा का प्रथम प्रयास नहीं है। इसके पूर्व अनेक पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशनार्थ प्रेषित की, लेकिन सखेद वापस आती रचनाओं ने मेरी लेखनी को कुछ समय के लिए अवरुद्ध कर दिया था। लेकिन कोटिशः धन्यवाद डिजिटल मीडिया के इस मंच को, जिसने मेरी रुकी हुई लेखनी को पुनः एक प्रवाह, एक गति प्रदान कर लिखने के उत्साह को एक बार फिर से प्रेरित किया। पुनश्च धन्यवाद!☺️ वंदना राय

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