फिक्र

in poems

है फिक्र उन्हे मेरी कितनी,

ये मुझको भी मालूम नही,

लोगों से कहते फिरते हैं,

क्या कहते हैं, मालूम नही|

है जेब गरम उनकी कितनी,

ये बतलाना होता है,

मेरी जेबों के छेदों को,

गिनकर जतलाना होता है|

 

पैसों की गर्मी अहंकारवश,

कब शोला बन जाती है!

रावण की सोने की लंका,

कब मिट्टी में मिल जाती है!

ये उनको भी मालूम नही,

ये हमको भी मालूम नही|