ख्वाहिशें

in poems

चलो, बढ़ती हुई उम्र के साए में बैठकर ,

जीवन की तेज धूप से ,

कुछ फासले कर लें,

चाहतों से भरे इस जीवन को ,

चलो, आज खाली कर लें ,

रोज बदलते किरदारों से ,

आज ,अभी ,तौबा कर लें ,

तुम अपनी तन्हाइयों को ,

रुखसत कर दो,

हम अपने सन्नाटों से आजादी ले लें ,

फिर, लहरों के किनारों पर ,

बालू में बैठकर ,

कुछ सीप में ढूंढे ,

और खुद को ही भूलें|

पिताजी के अंग्रेजी, उर्दू के कुहासे के बीच, मैंने अपनी माँँ के लोकगीतों को ही अधिक आत्मसात किया। उसी लोक संगीत की समझ ने मेरे अंदर काव्य का बीजा रोपण किया। "कवितानामा" मेरी काव्ययात्रा का प्रथम प्रयास नहीं है। इसके पूर्व अनेक पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशनार्थ प्रेषित की, लेकिन सखेद वापस आती रचनाओं ने मेरी लेखनी को कुछ समय के लिए अवरुद्ध कर दिया था। लेकिन कोटिशः धन्यवाद डिजिटल मीडिया के इस मंच को, जिसने मेरी रुकी हुई लेखनी को पुनः एक प्रवाह, एक गति प्रदान कर लिखने के उत्साह को एक बार फिर से प्रेरित किया। पुनश्च धन्यवाद!☺️ वंदना राय

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