प्रसंगवश

in poems

कुछ प्रासंगिक उत्तर के लिए,

हैं संदर्भित कुछ प्रश्न मेरे|

क्या शिक्षा सिर्फ प्रचार तक,

या आचरण व्यवहार तक?

स्वर्णिम इतिहास हमारा था,

ये देश जो इतना प्यारा था|

गंगा यमुनी तहज़ीब ने हम को,

बडे़ प्यार से पाला था|

नदियों को मैला कर डाला,

वृक्षों की चिता जला डाली,

वर्षावन जाने कहां गए?

मौसम ने चाल बदल डाली|

मन उद्वेलित , तन थका हुआ,

मानव स्वयं से ठगा हुआ|

ये परिभाषित विकास हैं?

या जीवन का अभिशाप हैं?

चलिए इस पर विचार करें,

कुछ संभावित  उपचार करें|

पिताजी के अंग्रेजी, उर्दू के कुहासे के बीच, मैंने अपनी माँँ के लोकगीतों को ही अधिक आत्मसात किया। उसी लोक संगीत की समझ ने मेरे अंदर काव्य का बीजा रोपण किया। "कवितानामा" मेरी काव्ययात्रा का प्रथम प्रयास नहीं है। इसके पूर्व अनेक पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशनार्थ प्रेषित की, लेकिन सखेद वापस आती रचनाओं ने मेरी लेखनी को कुछ समय के लिए अवरुद्ध कर दिया था। लेकिन कोटिशः धन्यवाद डिजिटल मीडिया के इस मंच को, जिसने मेरी रुकी हुई लेखनी को पुनः एक प्रवाह, एक गति प्रदान कर लिखने के उत्साह को एक बार फिर से प्रेरित किया। पुनश्च धन्यवाद!☺️ वंदना राय

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