उर्मिला का वनवास

in poems

उर्मिला बोली लक्ष्मण से,

व्यथित हृदय पर मृदु वचन से,

तुमको भाई का साथ मिला,

मुझे महलों का वनवास मिला,

दोष बता जाते मेरे,

तो दूर उन्हें मैं कर पाती,

फिर संग तुम्हारे जा पाती,

और साथ तुम्हारे रह पाती,

यूं बिना कहे तुम चले गए,

इस भवसागर में छोड़ गए,

किस से पूछूं किस हाल में हो,

या स्मृतियों के जाल में हो,

यदि कर्तव्य, प्रथम है श्रेष्ठ भाव,

तो मेरे भी पूर्ण करो  अभाव|

पिताजी के अंग्रेजी, उर्दू के कुहासे के बीच, मैंने अपनी माँँ के लोकगीतों को ही अधिक आत्मसात किया। उसी लोक संगीत की समझ ने मेरे अंदर काव्य का बीजा रोपण किया। "कवितानामा" मेरी काव्ययात्रा का प्रथम प्रयास नहीं है। इसके पूर्व अनेक पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशनार्थ प्रेषित की, लेकिन सखेद वापस आती रचनाओं ने मेरी लेखनी को कुछ समय के लिए अवरुद्ध कर दिया था। लेकिन कोटिशः धन्यवाद डिजिटल मीडिया के इस मंच को, जिसने मेरी रुकी हुई लेखनी को पुनः एक प्रवाह, एक गति प्रदान कर लिखने के उत्साह को एक बार फिर से प्रेरित किया। पुनश्च धन्यवाद!☺️ वंदना राय

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