सावन

in poems

मन ने फिर आवाज लगाई,

अब तो रहे न बाबा-आई।

जो कहते सावन में आओ,

भाई को राखी बंधवाओ।

इस आमंत्रण से गर्वित हो,

जब-जब मैं पीहर को जाती,

आंखों में नेह-अश्रु लिए तब,

बाबा-आई को मैं पाती।

न वैसा आमंत्रण है,अब।

न वैसा त्योहार……।

सम्बन्धों के खालीपन से,

अनुगुंजित आवास……।