भरम

in poems

जो उम्मीदों के गठ्ठर, उठाए बैठे हैं,

वो रिश्तों के चमन में मुरझाए बैठे हैं।

खुद की कुव्वत का जिन को,भरम हो रहा,

उनको लगता है,कि वो आसमां को उठाए बैठे हैं।