बचपन

in poems

मस्तमौला फक्कड़पन,

मासूमियत भरा बचपन,

महंगे खिलौनों की दरकार नहीं।

माटी से काम चला लेंगे,

 

हम आनंद मना लेंगे।

ये भोलापन,ये अल्हड़पन,

जिसको कहते हैं,सब बचपन।

पिताजी के अंग्रेजी, उर्दू के कुहासे के बीच, मैंने अपनी माँँ के लोकगीतों को ही अधिक आत्मसात किया। उसी लोक संगीत की समझ ने मेरे अंदर काव्य का बीजा रोपण किया। "कवितानामा" मेरी काव्ययात्रा का प्रथम प्रयास नहीं है। इसके पूर्व अनेक पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशनार्थ प्रेषित की, लेकिन सखेद वापस आती रचनाओं ने मेरी लेखनी को कुछ समय के लिए अवरुद्ध कर दिया था। लेकिन कोटिशः धन्यवाद डिजिटल मीडिया के इस मंच को, जिसने मेरी रुकी हुई लेखनी को पुनः एक प्रवाह, एक गति प्रदान कर लिखने के उत्साह को एक बार फिर से प्रेरित किया। पुनश्च धन्यवाद!☺️ वंदना राय

Latest from poems

Placeholder

नाप-तौल

लेन-देन की नाप-तोल, हर रिश्ते पर भारी है। रिश्तों को पैसों से

बीती बातें

याद आती हैं, बीती बातें, खट्टी मीठी कड़वी यादें, जीवन में आगे
Go to Top
%d bloggers like this: