अहिंसा के पुरोधा

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अहिंसा को यदि एक शब्द का महाकाव्य कहा जाए, तो उसके अनेक छंद इसी शब्द से प्रगट हो सकते हैं। महात्मा गांधी अहिंसा का प्रथम मानव छंद है ।गांधी मानवता के अलंकार हैं । 2 अक्टूबर को इस महा मानव ने जन्म लिया था। संयुक्त राष्ट्र ने इस दिन को अहिंसा दिवस भी घोषित किया है।

सत्यमूर्ति ,त्यागमूर्ति, करुणामूर्ति के रुप में गांधी पूरे विश्व में जाने पहचाने जाते हैं। गांधी अहिंसा नामक महाकाव्य  के महानायक हैं ।गांधी सत्य, सेवा और संयम की त्रिवेणी लेकर जन मानस पटल पर उतरे ।गांधी तो अपने गुरु भी स्वयं थे और शिष्य भी स्वयं ।सत्य उनके आचरण का प्रयोग था ,इसलिए सत्य को ही उन्होंने अपना प्रथम और अंतिम लक्ष्य बनाया ।इस सत्य को पाने का रास्ता उन्होंने सेवा के जरिए चुना ।

सेवा के मार्ग में उन्होंने स्वयं को कभी नहीं खोया ।गांधी ने अपने जीवन से जिस अहिंसा का महाकाव्य रचा ,उस महाकाव्य को अगर समझना है ,तो विनोबा भावे  उसके सर्वश्रेष्ठ टीकाकार कहे जा सकते हैं। विनोबाभावे एक प्रकार से गांधी का पुनर्पाठ है। विनोबा ने गांधी में तीन आदर्श देखे थे, जो उनकी अहिंसा महाकाव्य के तीन अलग-अलग सर्ग थे ।और तीनों सर्ग मिलकर एक नई कर्म गीता रचते थे ।

सहजीवन, सुविचार और संवाद से गांधी अपने अंदर एक साथ अपना गुरु और शिष्य दोनों जीते थे। अहिंसा के महाकाव्य में यदि सर्ग गिने जाएं, तोअहिंसा, सत्य, प्रेम, सेवा,करुणा, कर्म, ज्ञान, संयम, इन आठ सर्गो से यह महाकाव्य पूर्ण होता है।