‘बचपन’ आज और कल

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  • समय की थोड़ी सी इकाइयो का लेखा-जोखा नहीं, जीवन का सौंदर्य है बचपन ।आज बचपन की मोहक स्मृतियां दस्तक दे रही हैं ,इसलिए सुधी पाठकों से स्मृतियां सांझा करने के लिए लेखनी उतावली हो रही है।

गर्मी की छुट्टियां और शरारतो का दौर शुरु, धूल की परवाह किए बिना आंधियों में अमिया चुनने दौड़ पड़ना, बाबा थक जाते थे, यह कहते हुए ,कि मत जा बच्चा तेज हवाओं में , हम ला देंगे, बोरी भर आम। लेकिन उन खरीदे गए  बोरी भर आमो की दो चुनी हुई अमियो के आगे क्या बिसात ।

बड़े भाई की , मां से चुगली करना, जो पैंट की जेब में दो दो बिल्ली के बच्चे लेकर घूमता था। जो आधे जेब में समाते और आधे सिर निकालकर टुकुर टुकुर देखते थे ।पतंग की डोर लूट कर इठलाने वाला भोलापन चला गया । कागज़ की नाव को  दूर तक ले जाने वाले पानी की धार ने भी अपने हाथ पांव समेट लिए हैं । झूले की  पीन्गो से आसमानों पर राज करने वाली वह मासूम होड़ भी कहीं गुम हो गई है।

आजकल तो मासूम बच्चों से बचपन  ने ही अपने हाथ छुड़ा लिए हैं ।आजकल कमरे भर के खिलौने भी बच्चों का मनोरंजन नहीं कर पाते । बीते हुए कल में सात पत्थर भी काफी  थे, घंटो खेलने के लिए।

आज और कल के बीच वक्त का  फासला तो हमेशा से रहा है, लेकिन बचपन के मामले में या फासला जैसे खाई बन गया है । आज  जो हीं हम गुज़रे  ज़माने  की  बात करते हैं , तो बादलों के रंग, बारिश ,खुशबू ,तितलियों से मन का आकाश भर जाता है। आज के बचपन के पास रंग तो हैं ,लेकिन कलर बॉक्स और कंप्यूटर में बंद है । बारिशे पाठ्यक्रम का हिस्सा है ,खुशबूओ की विरासत उन तक पहुंचीं ही नहीं  और तितलियां ,वो तो कब की बागों के साथ ही चली  गई ।अब तो चिड़िया, बादल, पेड़ यहां तक कि रिश्ते भी दबे पांव दरवाजे की ओर चल पड़े हैं ।

आज भारी भरकम बस्ता टांगे ,टीवी देख कर जीवन की आधार भूमि बनाता, फास्ट फूड खाता और गला काट स्पर्धा में  2 वर्षों की उम्र में झोंक दिया जाने वाला बचपन समूचे मनोविज्ञान  को चुनौती दे रहा है। मेरी आज कि इन बातों का सार यही है, कि आज के बचपन को अपनी जड़ों ,अपनी मिट्टी की महक से परिचित कराने की पहल हम सब लोगों को जागरुक होकर करनी होगी । ताकि आज का बचपन अपनी मासूमियत में पुनर्जीवित हो जाए ।