नींव का पत्थर

in poems

जिस की कोमल अनुभूति से,

श्वांसे धड़क रही हैं,

बन के घर के नींव का पत्थर,

फिर भी सिसक रही हैं।

उसे “एक” दिन प्रेम प्रर्दशन में,

दुनिया न समेटे,

जो दुनिया को नवजीवन,

और देती बेटी बेटे।

जाकर कोई समझाओ,

दुनिया उनके आंसू पोंछे,

तब सार्थकता मातृदिवस की,

जब मांओं की पीड़ा सोखे।

पिताजी के अंग्रेजी, उर्दू के कुहासे के बीच, मैंने अपनी माँँ के लोकगीतों को ही अधिक आत्मसात किया। उसी लोक संगीत की समझ ने मेरे अंदर काव्य का बीजा रोपण किया। "कवितानामा" मेरी काव्ययात्रा का प्रथम प्रयास नहीं है। इसके पूर्व अनेक पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशनार्थ प्रेषित की, लेकिन सखेद वापस आती रचनाओं ने मेरी लेखनी को कुछ समय के लिए अवरुद्ध कर दिया था। लेकिन कोटिशः धन्यवाद डिजिटल मीडिया के इस मंच को, जिसने मेरी रुकी हुई लेखनी को पुनः एक प्रवाह, एक गति प्रदान कर लिखने के उत्साह को एक बार फिर से प्रेरित किया। पुनश्च धन्यवाद!☺️ वंदना राय

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