शकुन्तला

in poems

क्रोध को जीता नहीं,

और दे दिया अभिशप्त जीवन।

शकुन्तला जब बैठ कुटिया में,

कर रही थी, मधुर चिंतन।

दोष उसका बस यही था,

देख न पाई प्रलय को,

भावना में बह गयी,

पी गयी पीड़ा के गरल को।

निर्दोष शकुन्तला सोच रही,

वो किस समाज का हिस्सा है?

अपने अस्तित्व को खोज रही,

ये हर युग का ही किस्सा है।

पिताजी के अंग्रेजी, उर्दू के कुहासे के बीच, मैंने अपनी माँँ के लोकगीतों को ही अधिक आत्मसात किया। उसी लोक संगीत की समझ ने मेरे अंदर काव्य का बीजा रोपण किया। "कवितानामा" मेरी काव्ययात्रा का प्रथम प्रयास नहीं है। इसके पूर्व अनेक पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशनार्थ प्रेषित की, लेकिन सखेद वापस आती रचनाओं ने मेरी लेखनी को कुछ समय के लिए अवरुद्ध कर दिया था। लेकिन कोटिशः धन्यवाद डिजिटल मीडिया के इस मंच को, जिसने मेरी रुकी हुई लेखनी को पुनः एक प्रवाह, एक गति प्रदान कर लिखने के उत्साह को एक बार फिर से प्रेरित किया। पुनश्च धन्यवाद!☺️ वंदना राय

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