ज़न्नत

in poems

नि: शब्द धरा,आकाश मेघ,

कर रहे सभी, सिर्फ प्रश्न एक,

ज़न्नत की बातें , करते हो,

मरते हो बस ज़न्नत के लिए,

लेकिन ज़न्नत में रहते हो,

क्या तुमको ये एहसास नहीं?

ज़न्नत ज़न्नत, करते करते,

तुम इतने रक्त बहाते हो,

ज़न्नत जैसे कश्मीर को भी

क्यूं दोज़ख बनवाते हो?

आए हो, खाली हाथ ही,

और खाली ही जाओगे,

जाते जाते भी अपने सिर,

क्या रक्तपात ले जाओगे?

मुक्ति का केवल मार्ग एक,

करुणा और सद् भाव,

मातृभूमि भी सिसक रही,

क्यूं देते हो घाव?

पिताजी के अंग्रेजी, उर्दू के कुहासे के बीच, मैंने अपनी माँँ के लोकगीतों को ही अधिक आत्मसात किया। उसी लोक संगीत की समझ ने मेरे अंदर काव्य का बीजा रोपण किया। "कवितानामा" मेरी काव्ययात्रा का प्रथम प्रयास नहीं है। इसके पूर्व अनेक पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशनार्थ प्रेषित की, लेकिन सखेद वापस आती रचनाओं ने मेरी लेखनी को कुछ समय के लिए अवरुद्ध कर दिया था। लेकिन कोटिशः धन्यवाद डिजिटल मीडिया के इस मंच को, जिसने मेरी रुकी हुई लेखनी को पुनः एक प्रवाह, एक गति प्रदान कर लिखने के उत्साह को एक बार फिर से प्रेरित किया। पुनश्च धन्यवाद!☺️ वंदना राय

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