शिक्षक

in poems

अंधेरी स्याह रात में,
जो दीप बन के जल रहा,
प्रबुद्ध हो के आज भी,
पहचान को तरस रहा।
जो राष्ट्र का स्तंभ है,
समाज का प्रबंध है,
विद्यालय की शान है,
समाज का अभिमान है,
कहने कि जितनी बातें हैं,
उस पर उतनी ही घाते हैं,
मर्माहत उसकी प्राते हैं,
जब दोषी उसे बताते हैं।
आँँसू बन के जो बह न सका,
दर्द अपना जो कह ना सका,
वह शिक्षक है वह ज्ञाता है,
वह राष्ट्र का निर्माता है।

पिताजी के अंग्रेजी, उर्दू के कुहासे के बीच, मैंने अपनी माँँ के लोकगीतों को ही अधिक आत्मसात किया। उसी लोक संगीत की समझ ने मेरे अंदर काव्य का बीजा रोपण किया। "कवितानामा" मेरी काव्ययात्रा का प्रथम प्रयास नहीं है। इसके पूर्व अनेक पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशनार्थ प्रेषित की, लेकिन सखेद वापस आती रचनाओं ने मेरी लेखनी को कुछ समय के लिए अवरुद्ध कर दिया था। लेकिन कोटिशः धन्यवाद डिजिटल मीडिया के इस मंच को, जिसने मेरी रुकी हुई लेखनी को पुनः एक प्रवाह, एक गति प्रदान कर लिखने के उत्साह को एक बार फिर से प्रेरित किया। पुनश्च धन्यवाद!☺️ वंदना राय

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