विरहगीत

in poems

तारों की टिमटिम में हो तुम,
चिड़ियों की चहचह में हो तुम,
गंगा कि कलकल ध्वनि में तुम,
नटराज के डमरु की ध्वनि तुम,
गुंजित हो सभी दिशाओं में,
प्रतिष्ठित हो ह्रदय में तुम।
यूं अनायास क्यों चले गए?
मुझको तन्हा क्यों छोड़ गए?
संगीत की धुन बन लौट आओ,
मेरे जीवन में छा जाओ।
आओ देखो उन जख्मों को,
तेरे बिन जो अब तक नहीं भरे,
दुनिया की निर्मम चोटों से,
हरदम रहते जो हरे हरे।
कच्ची दुनिया में छोड़ गए,
पक्की चोटों से तोड़ गए,
मेरे इन रिसते घावों का,
अब कौन उपचार कराएगा?
शुभता के पैमानों पर,
अब कौन मुझे पहुंचाएगा?