बचपन

in poems

आँख खुली और टूट गया,

एक सपना था जो छूट गया,

माँ की लोरी पिता की थपकी,

जब जब मेरी आँखें झपकी,

देती है मुझको दिखलाई,

अपने शहर की याद जो आई,

गुल्ली डंडा, खाना पानी,

करती थी अपनी मनमानी,

उसपर पड़ी डाँट जो खानी,

याद आ गयी नानी,

मेरे बचपन की कहानी,

छतरी थी बहुत पुरानी,

उसपर बारिश का पानी,

नाले भर भर उफनाते,

उसमें हम नाव चलाते,

और बहुत दूर चले जाते,

फिर भाई मुझे पकड़ कर,

घर वापस ले आते,

माँ रगड़ रगड़ नहलाती,

फिर खूब उपदेश सुनाती,

मुझसे कसमें दिलवाती,

मैं बाज़ कभी ना आती,

फिर फिर करती मन मानी,

बचपन की याद सुहानी,

प्यारे बचपन तुम आओ,

मेरे वो पल लौटाओ।

पिताजी के अंग्रेजी, उर्दू के कुहासे के बीच, मैंने अपनी माँँ के लोकगीतों को ही अधिक आत्मसात किया। उसी लोक संगीत की समझ ने मेरे अंदर काव्य का बीजा रोपण किया। "कवितानामा" मेरी काव्ययात्रा का प्रथम प्रयास नहीं है। इसके पूर्व अनेक पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशनार्थ प्रेषित की, लेकिन सखेद वापस आती रचनाओं ने मेरी लेखनी को कुछ समय के लिए अवरुद्ध कर दिया था। लेकिन कोटिशः धन्यवाद डिजिटल मीडिया के इस मंच को, जिसने मेरी रुकी हुई लेखनी को पुनः एक प्रवाह, एक गति प्रदान कर लिखने के उत्साह को एक बार फिर से प्रेरित किया। पुनश्च धन्यवाद!☺️ वंदना राय

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