जीवन प्रत्याशा

in poems
स्व से ऊपर उठो ,
पुकारता ये तंत्र है,
स्व से ऊपर उठो,
जीवन का ये मंत्र है,
अनगिनत पीड़ित यहाँ पर,
अनगिनत शोषित यहाँ पर,
अनगिनत आँखे यहाँ पर,
जोहती है बाट तेरा,
कपकपाते हाथ उठते है ,
इस उम्मीद पे कि,
कोई तो आए जो,कह दे,
टूट मत तू , मैं हूँ तेरा,
जीवन जो बिखरा हुआ है,
इस आस में ठहरा हुआ है,
कि कोई तो होगा, यहाँ जो,
आकर कहे, सहरा हुआ है,
जीवन तो उनका भी है,
जो जीते जी मर जाते है,
जिसने इनके आँसू पोछे,
वे ही मानव कहलाते है ।