एक पत्र भाई के नाम

in poems

मन की व्यथा कहो ना भाई ,

दुनिया की परवाह हो करते ,

अपनी क्यूँ नहीं ली दवाई,

मन की व्यथा कहो ना भाई ।

बचपन के वह खेल पुराने ,

जरा चोट को अधिक बताते,

और वीर बन हमें डराते ,

अब क्यों अपने जख्मों को तुम,

आंखों से भी नहीं बताते ,

हंसकर कहते बढ़िया है सब,

जो भोलापन बचपन में था,

वैसे ही फिर क्यों ना बन पाते ।

दर्द सभी के होते अपने,

लेकिन हँस कर सहमे सहमे ,

फिर पथ में आगे बढ़ जाते ,

तुमने अपने जीवन जल को ,

क्यों इतना ठहराव दिया है,

फिर सारी दुनिया के लिए क्यों,

हंस-हंसकर हो कमल खिलाते,

खुद के जख्मों की करो विदाई ,

मन की दवा करो ना भाई ।

तुम्हारी बहन